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रक्षाबंधन : काम के एवज में पलायन किए हुए भाइयों का दर्द

लखनऊ: देश में रक्षाबंधन का त्योहार बड़े धूम धाम से मनाया जा रहा है। बहन थाली में तिलक, चंदन और राखी लेकर अपने भाई की कलाई को सजाने के लिए तैयार हैं। लेकिन आज बात उन भाईयों की जो काम के दबाव में, खुद के भविष्य को संवारने के लिए उस बहन से काफी दूर किसी शहर में आठ घंटे की शिफ्ट कर रहें है, जो उस बहन के प्यार के मोल में कहीं खड़ा हुआ नहीं दिखाई देता।

बचपन के वो दिन याद कीजिए जब सर पर ना काम का बोझ था, ना भविष्य संवारने की चिंता। हर साल सावन माह के पूर्णिमा के दिन बहन के सामने अजीवन उसकी रक्षा करने का संकल्प लेते थे। आज उन्हीं यादों को अपने ज़हन में समेटे किसी कीबोर्ड पर अपनी उँगलियों से वार करते हैं और उसे कोसते हैं कि अगर तु मेरी जिंदगी में ना आया होता, तो मैं आज अपनी बहन के आंसुओ की वजह न बनता।

ये इंटरनेट की दुनिया भी बहुत अनोखी है। हजारों किलोमीटर दूर बैठी वो बहन अपने भाई को तो देख लेती है लेकिन ये इंटरनेट उस दर्द को महसूस नहीं कर पाता जो उस फ़ोन के कटने के बाद छलक उठता है। वो खुद को समझा रहा है कि हर दिन की तरह ये दिन भी ढल जाएगा।

लेकिन उसके अंदर की बेचैनी उसको सोचने पर मजबूर कर रही है कि आखिर उसके जीवन में ये कैसी मजबूरियां हैं कि वो एक दिन के लिए उसके पास नहीं जा पा रहा जो पूरे साल उसकी सुनी कलाई को एक दिन के लिए ही सही रौनक कर देती हैं। वो घबरा रहा है, मचल रहा है, परेशान है लेकिन वो कुछ नहीं कर सकता। अब उसकी ये मजबूरियां आंसू की शक्ल में बदल जाती हैं और वो फिर उस कीबोर्ड पर वार करने लगता है।

Adarsh Kumar
the authorAdarsh Kumar