Friday , 9 December 2016

स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं की भूमिका पर आधारित पुस्तक का विमोचन

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लखनऊ साहित्य फेस्टिवल, प्रोफेसर कीर्ति नारायण, पुस्त।क का विमोचन, नवाब वाजिद अली शाह

Book Release of Prof Kirti Narain

लखनऊ साहित्‍य फेस्टिवल में प्रो. कीर्ति नारायण की पुस्‍तक का विमोचन

लखनऊ। लखनऊ साहित्य फेस्टिवल में प्रोफेसर कीर्ति नारायण द्वारा लिखित “पार्टिसिपेशन एंड पोजिशन ऑफ वोमेन- अपराइजिंग ऑफ 1857- रिडिफिनिशन ऑफ सोशल स्टैटसः देन एंड नाउ“पुस्तक का विमोचन किया गया। पुस्‍तक की लेखिका प्रोफेसर कीर्ति नारायण ने कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं को बताया लेकिन उनका मुख्य फोकस ‘महिला कारक’ पर था।

यह विमोचन कार्यक्रम प्रभावशाली था और वह इस स्तर पर विद्रोह से जुड़े कई खिलाडि़यों की वंशज थीं। मुख्य अतिथि नवाब वाजिद अली शाह की पहली बेगम के वंशज डा. एस.ए.सादिक थे।

अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह द्वितीय की पौत्रवधू सुल्ताना बेगम कोलकाता से आई थीं। बेगम हजरत महल की वंशज मंजिलत भी कोलकाता से आई थीं। इसके अलावा, इस विद्रोह के दौरान अन्य अज्ञात लेकिन महत्वपूर्ण वंशज थे जिन्होंने कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों से सहयोग करने में असली भूमिका निभाई थी।

इस विमोचन कार्यक्रम में लेखक द्वारा की गई प्रस्तुति द्वारा जीवंत पैनल चर्चा की गई। इस पैनल का संचालन क्लेयरमाउंट मैकेना कॉलेज, क्लेयरमाउंट, कैलीफोर्निया में दक्षिण एशियाई इतिहास की ब्राउन फेमिली प्रोफेसर नीता कुमार द्वारा किया गया। अन्य प्रख्यात पैनलिस्ट वाइस-एडमिरल पीएस दास थे, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ समूह में होते हुए प्रधानमंत्री के कार्यालय में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में भी सेवा की है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहासकार और प्रोफेसर सीमा अल्वी भी मौजूद थीं। एडमिरल दास ने कहा, “डा0 नारायण का कार्य मौलिक प्रकृति का है तथा इसे अभी तक वृहद रूप से स्पर्श नहीं किया गया है। यह केवल इतिहासकारों के लिए ही नहीं बल्कि सभी भारतीयों के लिए उपयोगी पुस्तक होगी।“

अल्वी ने टिप्पणी की, “यह पुस्तक महिला विद्रोहियों के योगदान को दर्शाते हुए 1857 के विद्रोह पर प्रकाश डालती है। सुंदर ढंग से प्रस्तुत की गई, कर्तव्यपूर्ण ढंग से शोध की हुई और स्पष्टतापूर्वक लिखी गई यह पुस्तक इतिहासकारों और प्रबुद्ध पाठकों दोनों के लिए एक उपहार है।“

लेखिका की बातें

प्रोफेसर नारायण ने कहा कि यह पुस्तक कई सालों की प्राथमिक और द्वितीयक शोध का नतीजा है। इसमें व्यापक यात्रा और वंशजों और विशेषज्ञों के व्यक्ति साक्षात्कार शामिल है। हमने कई अज्ञात महिलाओं को प्रकट किया है जो समाज के विभिन्न हिस्सों की थीं और उन्नति में अपना योगदान दिया है।

प्रोफेसर नारायण गिरि इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज, लखनऊ में परियोजना निदेशक थीं, जहाँ “मेरी एक अद्भुत शोध सहायिका, डा0 अमीना हसन थीं, जो इस पुस्तक की रीढ़ की हड्डी हैं। भूगोलवेत्ता के रूप में उन्होंने मेधावी इतिहासकार होना साबित किया है।“

वह जय हिंद कॉलेज, मुंबई के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुईं और हांगकांग के चीनी विश्वविद्यालय में अनुबद्ध प्रोफेसर थीं, जहाँ उन्होंने भारतीय इतिहास को पेश किया। उन्होंने महिलाओं पर व्यापक रूप से काम किया है, बहुत ज्यादा व्यापक रूप से प्रकाशन किया है तथा कई पुरस्कार प्राप्त किये हैं।

इस पुस्तक के संबंध में तीन कार्यक्रम दिल्ली और कोलकाता में विमोचन कार्यक्रम के बाद दिसंबर में मुंबई में होने हैं। “लखनऊ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मैंने लोरेटो और विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है, अतः मैंने यहाँ पर प्रथम विमोचन करने की योजना बनाई।“

पुस्तक के बारे में

1857 के विद्रोह में महिलाओं की भागीदारी अभी भी ऐसा क्षेत्र है जिसे उजागर करने और शोध करने की आवश्यकता है। पुस्तक में उत्थान के लिए प्रयोग किये गये शब्द ‘बगावत’ और ‘विद्रोह’ हैं और इनका अदल-बदलकर प्रयोग किया गया है।

केवल 1857 की ज्ञात और अज्ञात नायिकाओं का वर्णन ही नहीं किया गया है बल्कि उन्हें इस ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि संघर्ष का भारतीय और यूरोपीय महिलाओं की जीवन पर असर को सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया जाए। भागीदारी का आकलन भिन्न था और योद्धा से लेकर दीन योगदानकर्ता के रूप में महिलाओं ने अपना योगदान दिया।

‘महिलाओं की भागीदारी’ शब्द को व्यापक समझ में प्रयोग किया गया है जिसे लोकप्रिय ढंग से समझा जाए। ‘महिला कारक’ को अकेले नहीं समझा जा सकता है और प्रमुख पुरुषों की भूमिका को समग्र रुचि से वर्णन किया गया है।

महिलाएँ भी सामान्य सामाजिक मुद्दों के हिस्से के रूप में वर्गीकृत की गई हैं जो उन्हें प्रभावित करते हैं, वे मुद्दे जो उस समय सामाजिक गतिविधियों के रूप में प्रचलित थे। सामाजिक पहलू मुद्दों की नित्यता के संबंध में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं जो उस काल के समाज में उपयुक्त थे और मध्य उन्नीसवीं शताब्दी में उन्हें दुहराया गया।

‘अब’ कारक का प्राकृतिक पहलू 1857 के ज्ञात और अज्ञात नायकों के वंशजों का प्रश्न है। इस तस्वीर को पूरा करने के लिए मीडिया और लेखन में प्रक्षेप ऐतिहासिक और समकालीन दोनों को शामिल किया गया है तथा विश्लेषण किया गया है। यह धारणा कि इस विद्रोह का फैलाव सीमित था, विद्रोह के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों द्वारा संबोधित किया गया है, और अनुकूल मानचित्रों द्वारा दर्शाया गया है, अतः यह उन्नति के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।

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