Friday , 9 December 2016

मुलायम के दांव से कई खेमो में खलबली, गठबंधन राजनीति की तरफ बढे कदम

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मुलायम सिंह यादव, सूबे में चुनावी आहट, लोहियावादी चरणसिंह वादी और गांधीवादी, शिवपाल सिंह, चौधरी अजित सिंह

mulayam singh yadav

अथर्व

लखनऊ। सूबे में चुनावी आहट सुनाई देने लगी है। नेताओ के सुर बदलने लगे हैं। गठबंधन की कवायद भी शुरू हो रही है। सूबे में चुनाव आयोग भी कदमताल करने लगा है। उत्तर प्रदेश में भले ही चुनाव होने में चार महीने बाक़ी है। हलचल अभी से शुरू हो गयी है। जहाँ एक ओर लोहियावादी,  चरणसिंह वादी और गांधीवादी एक छाते के नीचे इकट्ठा होने लगे हैं।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने अनुज शिवपाल सिंह को अपना दूत बना बनाकर कवायद शुरू कर दी है। पहले चरण की वार्ता भी शुरू हो  गयी है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के छत्तरप चौधरी अजित सिंह जाट बेल्ट में अपनी खोई हुई जमीन पाने को बेताब दिख रहे हैं।

2014 में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जाट बिरादरी में सेंध लगाते हुए क्लीन स्वीप किया था। जहाँ अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत भी अपनी सीट बचा नहीं पाए। पूरे प्रदेश में सिर्फ गाँधी परिवार के सोनिया गांधी और राहुल गाँधी अमेठी और रायबरेली पर अपना परचम फहरा पाए और पूरे प्रदेश में उनके प्रत्याशी अपनी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए।

समाजवादी पार्टी से सिर्फ मुलायम सिंह का कुनबा ही लोकसभा तक पहुच सका। सबसे बुरी पोजीशन तो दलित वोट की राजनीत करने वाली बसपा की हुई। मायावती का तो खाता ही नही खुल सका। उनके सारे प्रत्याशी बुरी तरह से पराजित हुए।

ऐसे में राजनेताओं को सफलता उसी को मिलती दिख रही है जो वोटो का बिखराव रोक सके। खासकर अपनी बिरादरी और निर्यायक वोटो को। सूबे का मुसलमान वोट उसी पार्टी की तरफ झुकता दिखेगा जो भाजपा को पटकनी देती हई दिखेगी। ऐसी स्थिति को मुलायम सिंह बखूबी भांप गए हैं। इसलिए उनकी  गठबंधन की कवायद तेज हो गयी है।

उनके दांव से बसपा और भाजपा में खलबली मच गयी है। अमित शाह की पेशानी पे बल पड़ने लगे हैं। इसलिए उन्होंने भी जाट लैंड से चुनावी शुरुवात कर दी है। अपने समीकरण ठीक कर रहें हैं। दूसरी तरफ दलित वोट के साथ साथ और वोट जुटाने की कवायद मायावती ने शुरू कर दी है।

बसपा से कई बड़े नेताओ के नाता तोड़ने से मायावती के कई समीकरण बिगड़ गए हैं। उन्हे दुरुस्त करना आसान नहीं दिख रहा है। स्वामी प्रसाद मौर्या, आरके चौधरी, ब्रजेश पाठक, जुगल किशोर जैसे तमाम पुराने बसपाइयों के जाने से माया को झटका लगा है। ब्राह्मण वोट 2007 की तरह बसपा की तरफ झुकता नहीं दिख रहा है। उनका बसपा से मोहभंग हुआ है। अब देखना यह होगा की भविष्य में मुलायम का  दांव कितना कारगर होगा ।

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